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- ॐ सम्पूर्ण अस्तित्व की मौन ध्वनि और चेतना का आदिस्पंद है।
- यह साधक के लिए किसी बाहरी प्रतीक से अधिक भीतर उपस्थित चेतना का स्मरण है।
- हर श्वास, हर अनुभव और हर जागरूक क्षण में ॐ की उपस्थिति को अनुभव किया जा सकता है।
- साधना की यात्रा बाहर कुछ प्राप्त करने की नहीं, बल्कि भीतर जो है उसे पहचानने की यात्रा है।
- ॐ का स्मरण साधक को अपने केंद्र की ओर लौटने का सहज अवसर देता है।
- मौन में उतरते हुए साधक धीरे-धीरे ध्वनि के पार स्थित उस निःशब्द चेतना को अनुभव करना सीखता है।
- यह स्मरण जीवन के सामान्य क्षणों को भी साधना के क्षणों में बदल सकता है।
- ॐ साधक को समर्पण, सजगता और आत्मानुभूति की दिशा में स्थिर करता है।
- जब स्मरण निरंतर होने लगता है, तो साधना और जीवन के बीच का अंतर धीरे-धीरे मिटने लगता है।
- तब साधक अपने प्रत्येक अनुभव को चेतना के साथ देखने और जीने लगता है।
- इसी जीवंत स्मरण से अघोर आनंद साधक की यात्रा प्रारंभ होती है।
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