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- आत्मक्रांतिकारी वह साधक है जो अपने भीतर परिवर्तन की संभावना को निरंतर जीवित रखता है।
- उसकी जिज्ञासा केवल जानने की नहीं, बल्कि सत्य को अनुभव करके जीवन में उतारने की जिज्ञासा है।
- अभिनव जिज्ञासा उसे पुराने निष्कर्षों को भी नए अनुभवों की रोशनी में देखने का साहस देती है।
- जिद्द, ज्ञान और साहस उसके लिए विरोधी नहीं, बल्कि साधना में उचित दिशा पाने वाले तीन आंतरिक बल हैं।
- स्वातंत्र्य शक्ति उसे अपनी साधना को अपनी वास्तविक प्रकृति के अनुसार विकसित करने की स्वतंत्रता देती है।
- आल्हादिनी शक्ति उसके अनुभवों में सहज आनंद और रस को जागृत करती है।
- आनंद शक्ति साधना को केवल अनुशासन न रखकर जीवंत अनुभव में बदल देती है।
- आत्मक्रांतिकारी अपने दोषों को छिपाने के बजाय उन्हें देखने और उनसे सीखने का साहस रखता है।
- वह स्वयं को तोड़ने की नहीं, बल्कि असत्य पर टिके हुए आवरणों को पहचानकर उनसे मुक्त होने की क्रांति करता है।
- उसकी क्रांति बाहर किसी व्यवस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि भीतर की जड़ता, अज्ञान और असजगता के विरुद्ध होती है।
- ऐसी आत्मक्रांति को गहराई देने के लिए साधक को अपनी एकांत साधना-भूमि की ओर उतरना पड़ता है—अघोर आत्मलिंग गुफा।
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