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दिव्य साधनसामग्री

दिव्य साधनसामग्री

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  1. दिव्य साधनसामग्री वे साधन हैं जो साधक की साधना को दृढ़ता, अनुशासन और निरंतरता प्रदान करते हैं।
  2. ये केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि साधना के साथ लंबे समय से जुड़े हुए मौन सहयात्री हैं।
  3. किसी माला, वाद्य, आसन, पात्र, दीप या अन्य साधन का महत्व उसके बाहरी रूप से अधिक उसके साधना-संबंध में हो सकता है।
  4. नियमित उपयोग से इन साधनों के साथ साधक की स्मृति, भावना और अनुभव का एक विशेष संबंध विकसित होता जाता है।
  5. वे साधक को अपने संकल्प और साधना की दिशा का स्मरण कराने वाले संकेत बन सकते हैं।
  6. इनका स्थान प्रदर्शन या संग्रह का नहीं, बल्कि साधना में उपयोग और सजगता का है।
  7. साधन सामग्री साधक की सुविधा बढ़ाती है, पर साधना का वास्तविक केंद्र साधक की चेतना और उसका अभ्यास ही रहता है।
  8. इनके प्रति सम्मान का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि उस साधना-परंपरा और अनुभव का सम्मान है जिससे वे जुड़े हैं।
  9. जब साधक इन्हें सजगता से उपयोग करता है, तो साधारण वस्तुएँ भी साधना के वातावरण को गहरा कर सकती हैं।
  10. इस प्रकार दिव्य साधनसामग्री बाहरी उपकरण से भीतर की स्मृति तक एक सूक्ष्म सेतु बनती है।
  11. और यही निरंतरता साधक को नित्यनूतन उपासना की ओर ले जाती है।

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