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- अघोर आनंद भजन साधक के अंतःकरण से सहज रूप से प्रस्फुटित होने वाली प्रभुस्मरण की अभिव्यक्ति है।
- साधक के जीवन में संगीत केवल कला नहीं, बल्कि अनुभव, साधना और भाव की अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम बन सकता है।
- साधु-संतों के अनुभवों की परिणति उनके वचनों, गीतों, अभंगों और रचनाओं में जिस तरह प्रकट हुई है, उसी परंपरा की एक जीवंत धारा भजन है।
- साधना के पश्चात शांत प्रभुस्मरण, प्रभुचिंतन और प्रभुभजन साधक के भीतर भाव को गहराई दे सकते हैं।
- भजन गाते समय साधक किसी प्रदर्शन या कलाकृति को प्रस्तुत करने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति अपने भाव को अर्पित करने के लिए गाता है।
- शब्द और ध्वनि जब समर्पित भाव से प्रकट होते हैं, तो वे साधक के भीतर भावसमाधि जैसी एकाग्रता और तल्लीनता जगा सकते हैं।
- उस ध्वनि का प्रभाव केवल गाने वाले तक सीमित नहीं रहता; सुनने वाले साधक में भी स्मरण और जागरूकता का स्पंदन उत्पन्न हो सकता है।
- अघोर आनंद भजन इसलिए मनोरंजन से अधिक चेतना को जगाने वाला प्रभुनाम का सहज प्रवाह है।
- यह भजन मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि प्राणीमात्र, प्रकृति और चर-अचर जगत के प्रति एक व्यापक मंगलभाव का विस्तार है।
- जब प्रभुनाम भाव से गूंजता है, तो साधक स्वयं को उस ध्वनि का कर्ता कम और माध्यम अधिक अनुभव करने लगता है।
- यहीं से जीवन में एक ऐसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति जन्म लेती है जिसे जीवन मुक्तछंद कहा जा सकता है।
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