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अघोर आनंद भजन

अघोर आनंद भजन

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  1. अघोर आनंद भजन साधक के अंतःकरण से सहज रूप से प्रस्फुटित होने वाली प्रभुस्मरण की अभिव्यक्ति है।
  2. साधक के जीवन में संगीत केवल कला नहीं, बल्कि अनुभव, साधना और भाव की अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम बन सकता है।
  3. साधु-संतों के अनुभवों की परिणति उनके वचनों, गीतों, अभंगों और रचनाओं में जिस तरह प्रकट हुई है, उसी परंपरा की एक जीवंत धारा भजन है।
  4. साधना के पश्चात शांत प्रभुस्मरण, प्रभुचिंतन और प्रभुभजन साधक के भीतर भाव को गहराई दे सकते हैं।
  5. भजन गाते समय साधक किसी प्रदर्शन या कलाकृति को प्रस्तुत करने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति अपने भाव को अर्पित करने के लिए गाता है।
  6. शब्द और ध्वनि जब समर्पित भाव से प्रकट होते हैं, तो वे साधक के भीतर भावसमाधि जैसी एकाग्रता और तल्लीनता जगा सकते हैं।
  7. उस ध्वनि का प्रभाव केवल गाने वाले तक सीमित नहीं रहता; सुनने वाले साधक में भी स्मरण और जागरूकता का स्पंदन उत्पन्न हो सकता है।
  8. अघोर आनंद भजन इसलिए मनोरंजन से अधिक चेतना को जगाने वाला प्रभुनाम का सहज प्रवाह है।
  9. यह भजन मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि प्राणीमात्र, प्रकृति और चर-अचर जगत के प्रति एक व्यापक मंगलभाव का विस्तार है।
  10. जब प्रभुनाम भाव से गूंजता है, तो साधक स्वयं को उस ध्वनि का कर्ता कम और माध्यम अधिक अनुभव करने लगता है।
  11. यहीं से जीवन में एक ऐसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति जन्म लेती है जिसे जीवन मुक्तछंद कहा जा सकता है।

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