BACK TO TOP

जीवन मुक्तछंद

जीवन मुक्तछंद

Initial content stream

  1. जीवन मुक्तछंद वह सहज अवस्था है जहाँ साधक का जीवन केवल करने से नहीं, बल्कि होने से अभिव्यक्त होने लगता है।
  2. करने का आग्रह धीरे-धीरे पीछे छूटता है और भीतर की स्वतंत्रता से अभिव्यक्ति स्वयं प्रकट होने लगती है।
  3. भजन, वाणी, कविता, संगीत, चित्र या कोई अन्य सृजन इसी सहज प्रवाह के माध्यम बन सकते हैं।
  4. साधक किसी उपलब्धि को पकड़ने या स्वयं को सिद्ध करने के लिए सृजन नहीं करता।
  5. स्थिरता, स्वतंत्रता और आत्मभान में बहुत कुछ अपने आप घटित होने लगता है।
  6. मुक्तछंद का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि भीतर से जन्मी उस लय को पहचानना है जो साधक के वास्तविक स्वरूप से आती है।
  7. जीवन के प्रति यह दृष्टि साधक को अनुभवों को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें सजगता से जीने की स्वतंत्रता देती है।
  8. जब भीतर का भय और प्रदर्शन का आग्रह कम होता है, तब अभिव्यक्ति अधिक स्वाभाविक और सच्ची हो जाती है।
  9. जीवन स्वयं एक सृजन बन जाता है और साधक उस सृजन का सजग सहभागी बनकर जीता है।
  10. यही सहजता साधक को स्वयं को स्वीकारने और अपने भीतर उपस्थित कृपा को पहचानने की ओर ले जाती है।
  11. और उस पहचान का एक गहरा रूप है—आत्मस्वरूप कृपा।

Future chronological entries