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- जीवन मुक्तछंद वह सहज अवस्था है जहाँ साधक का जीवन केवल करने से नहीं, बल्कि होने से अभिव्यक्त होने लगता है।
- करने का आग्रह धीरे-धीरे पीछे छूटता है और भीतर की स्वतंत्रता से अभिव्यक्ति स्वयं प्रकट होने लगती है।
- भजन, वाणी, कविता, संगीत, चित्र या कोई अन्य सृजन इसी सहज प्रवाह के माध्यम बन सकते हैं।
- साधक किसी उपलब्धि को पकड़ने या स्वयं को सिद्ध करने के लिए सृजन नहीं करता।
- स्थिरता, स्वतंत्रता और आत्मभान में बहुत कुछ अपने आप घटित होने लगता है।
- मुक्तछंद का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि भीतर से जन्मी उस लय को पहचानना है जो साधक के वास्तविक स्वरूप से आती है।
- जीवन के प्रति यह दृष्टि साधक को अनुभवों को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें सजगता से जीने की स्वतंत्रता देती है।
- जब भीतर का भय और प्रदर्शन का आग्रह कम होता है, तब अभिव्यक्ति अधिक स्वाभाविक और सच्ची हो जाती है।
- जीवन स्वयं एक सृजन बन जाता है और साधक उस सृजन का सजग सहभागी बनकर जीता है।
- यही सहजता साधक को स्वयं को स्वीकारने और अपने भीतर उपस्थित कृपा को पहचानने की ओर ले जाती है।
- और उस पहचान का एक गहरा रूप है—आत्मस्वरूप कृपा।
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