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- आत्मस्वरूप कृपा वह आंतरिक कृपा है जिसके बिना ईश्वर कृपा, गुरु कृपा और साधु-संत कृपा भी साधक के जीवन में पूरी तरह फलित नहीं हो पाती।
- साधक के जीवन में अनेक प्रकार की कृपा उपस्थित हो सकती है, पर उन्हें स्वीकारने और जीने के लिए भीतर आत्मबल का जागना आवश्यक है।
- जब साधक स्वयं पर विश्वास करता है, अपने साध्य को स्वीकार करता है और अपने भीतर उपस्थित दिव्य शक्ति को पहचानता है, तब आत्मकृपा प्रकट होती है।
- यही आत्मकृपा आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मनिर्धार को मजबूत करती है।
- आत्मविश्वास यहाँ अहंकार नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित परमात्मीय संभावना पर विश्वास है।
- जितना गहरा परमात्मविश्वास और गुरुविश्वास होता है, उतना ही साधक का आत्मबल स्थिर और समर्थ होता जाता है।
- अपने आपको पहचानना, स्वीकारना और दिव्य अनुग्रह को अपने जीवन में स्थान देना भी आत्मकृपा का ही एक रूप है।
- यह स्वयं को हर परिस्थिति में सही मानना नहीं, बल्कि स्वयं को ईमानदारी से स्वीकारकर आगे बढ़ने की क्षमता है।
- आत्मकृपा साधक को यह अनुभव देती है कि वह साधना के मार्ग पर अकेला नहीं, बल्कि भीतर से समर्थित है।
- अंततः आत्मकृपा और परमात्मकृपा एक-दूसरे से अलग नहीं रहतीं; भीतर जागृत विश्वास ही दिव्य कृपा की जीवंत अभिव्यक्ति बन जाता है।
- और जब यह कृपा जीवन में प्रवाहित होती है, तो यात्रा केवल साधना नहीं रहती—वह आरपार आनंद का उत्सव बन जाती है।
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