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- आरपार आनंद उत्सव जीवन को उसकी संपूर्णता में स्वीकारते हुए आनंद की सहज अभिव्यक्ति है।
- यह किसी बाहरी आयोजन तक सीमित उत्सव नहीं, बल्कि भीतर और बाहर के बीच के भेद को पार करने वाला अनुभव है।
- साधक के लिए आनंद केवल सुखद परिस्थिति का परिणाम नहीं, बल्कि चेतना के साथ जुड़कर जीने की एक अवस्था है।
- आरपार का भाव उसे सतह से गहराई की ओर और अनुभव से आत्मानुभूति की ओर ले जाता है।
- इस उत्सव में साधना और जीवन अलग-अलग नहीं रहते; दैनिक कर्म, संगीत, भजन, मौन और संबंध सभी अपनी जगह अर्थपूर्ण हो सकते हैं।
- उत्सव का अर्थ लगातार प्रसन्न दिखाई देना नहीं, बल्कि जीवन के सुख-दुःख दोनों को सजगता से स्वीकारने की क्षमता है।
- जब साधक अपने अनुभवों से भागता नहीं, तो उन्हीं अनुभवों के भीतर से आनंद की एक गहरी धारा प्रकट हो सकती है।
- आरपार आनंद में अभिव्यक्ति व्यक्तिगत होकर भी व्यापक मंगलभाव से जुड़ती है।
- यह आनंद केवल साधक के लिए नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, वाणी, सृजन और उपस्थिति के माध्यम से आसपास के जीवन तक पहुँच सकता है।
- इस प्रकार उत्सव साधना की परिणति न होकर स्वयं साधना के जीवंत प्रवाह का एक रूप बन जाता है।
- और इस पूरे प्रवाह को साक्षीभाव से जीना ही ॐ अघोर आनंद परिक्रमा की ओर ले जाता है।
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