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अखंड आत्मभान

अखंड आत्मभान

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  1. अखंड आत्मभान अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति निरंतर जागरूक रहने की जीवंत अवस्था है।
  2. यह केवल किसी विचार या दार्शनिक समझ का नाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में सजग रहने का अभ्यास है।
  3. साधक अपने विचारों, भावों, प्रतिक्रियाओं और कर्मों को देखते हुए स्वयं की ओर लौटना सीखता है।
  4. आत्मभान का अर्थ अपने अनुभवों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें स्पष्टता और साक्षीभाव से देखना है।
  5. यह जागरूकता धीरे-धीरे साधक की देखने और समझने की दृष्टि को भीतर से बदलने लगती है।
  6. जब आत्मभान गहरा होता है, तो बाहरी परिस्थितियाँ साधक को पूरी तरह अपने साथ बहा नहीं ले जातीं।
  7. वह प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया के बीच उपस्थित उस सूक्ष्म स्थान को पहचानने लगता है जहाँ चुनाव संभव होता है।
  8. अखंड आत्मभान साधना को केवल किसी निश्चित समय की क्रिया न रखकर पूरे जीवन में विस्तृत करता है।
  9. हर अनुभव स्वयं को पहचानने का दर्पण बन सकता है और हर क्षण लौटने का निमंत्रण।
  10. इसी निरंतर स्मरण से साधक के भीतर साधना अधिक व्यक्तिगत, सहज और जीवंत होने लगती है।
  11. यहीं से अघोर आनंद साधन अपने विशिष्ट और नित्यनूतन स्वरूप में प्रकट होता है।

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