BACK TO TOP

आत्मक्रांतिकारी

आत्मक्रांतिकारी

Initial content stream

  1. आत्मक्रांतिकारी वह साधक है जो अपने भीतर परिवर्तन की संभावना को निरंतर जीवित रखता है।
  2. उसकी जिज्ञासा केवल जानने की नहीं, बल्कि सत्य को अनुभव करके जीवन में उतारने की जिज्ञासा है।
  3. अभिनव जिज्ञासा उसे पुराने निष्कर्षों को भी नए अनुभवों की रोशनी में देखने का साहस देती है।
  4. जिद्द, ज्ञान और साहस उसके लिए विरोधी नहीं, बल्कि साधना में उचित दिशा पाने वाले तीन आंतरिक बल हैं।
  5. स्वातंत्र्य शक्ति उसे अपनी साधना को अपनी वास्तविक प्रकृति के अनुसार विकसित करने की स्वतंत्रता देती है।
  6. आल्हादिनी शक्ति उसके अनुभवों में सहज आनंद और रस को जागृत करती है।
  7. आनंद शक्ति साधना को केवल अनुशासन न रखकर जीवंत अनुभव में बदल देती है।
  8. आत्मक्रांतिकारी अपने दोषों को छिपाने के बजाय उन्हें देखने और उनसे सीखने का साहस रखता है।
  9. वह स्वयं को तोड़ने की नहीं, बल्कि असत्य पर टिके हुए आवरणों को पहचानकर उनसे मुक्त होने की क्रांति करता है।
  10. उसकी क्रांति बाहर किसी व्यवस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि भीतर की जड़ता, अज्ञान और असजगता के विरुद्ध होती है।
  11. ऐसी आत्मक्रांति को गहराई देने के लिए साधक को अपनी एकांत साधना-भूमि की ओर उतरना पड़ता है—अघोर आत्मलिंग गुफा।

Future chronological entries