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- दिव्य साधनसामग्री वे साधन हैं जो साधक की साधना को दृढ़ता, अनुशासन और निरंतरता प्रदान करते हैं।
- ये केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि साधना के साथ लंबे समय से जुड़े हुए मौन सहयात्री हैं।
- किसी माला, वाद्य, आसन, पात्र, दीप या अन्य साधन का महत्व उसके बाहरी रूप से अधिक उसके साधना-संबंध में हो सकता है।
- नियमित उपयोग से इन साधनों के साथ साधक की स्मृति, भावना और अनुभव का एक विशेष संबंध विकसित होता जाता है।
- वे साधक को अपने संकल्प और साधना की दिशा का स्मरण कराने वाले संकेत बन सकते हैं।
- इनका स्थान प्रदर्शन या संग्रह का नहीं, बल्कि साधना में उपयोग और सजगता का है।
- साधन सामग्री साधक की सुविधा बढ़ाती है, पर साधना का वास्तविक केंद्र साधक की चेतना और उसका अभ्यास ही रहता है।
- इनके प्रति सम्मान का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि उस साधना-परंपरा और अनुभव का सम्मान है जिससे वे जुड़े हैं।
- जब साधक इन्हें सजगता से उपयोग करता है, तो साधारण वस्तुएँ भी साधना के वातावरण को गहरा कर सकती हैं।
- इस प्रकार दिव्य साधनसामग्री बाहरी उपकरण से भीतर की स्मृति तक एक सूक्ष्म सेतु बनती है।
- और यही निरंतरता साधक को नित्यनूतन उपासना की ओर ले जाती है।
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