BACK TO TOP

Initial content stream

  1. ॐ सम्पूर्ण अस्तित्व की मौन ध्वनि और चेतना का आदिस्पंद है।
  2. यह साधक के लिए किसी बाहरी प्रतीक से अधिक भीतर उपस्थित चेतना का स्मरण है।
  3. हर श्वास, हर अनुभव और हर जागरूक क्षण में ॐ की उपस्थिति को अनुभव किया जा सकता है।
  4. साधना की यात्रा बाहर कुछ प्राप्त करने की नहीं, बल्कि भीतर जो है उसे पहचानने की यात्रा है।
  5. ॐ का स्मरण साधक को अपने केंद्र की ओर लौटने का सहज अवसर देता है।
  6. मौन में उतरते हुए साधक धीरे-धीरे ध्वनि के पार स्थित उस निःशब्द चेतना को अनुभव करना सीखता है।
  7. यह स्मरण जीवन के सामान्य क्षणों को भी साधना के क्षणों में बदल सकता है।
  8. ॐ साधक को समर्पण, सजगता और आत्मानुभूति की दिशा में स्थिर करता है।
  9. जब स्मरण निरंतर होने लगता है, तो साधना और जीवन के बीच का अंतर धीरे-धीरे मिटने लगता है।
  10. तब साधक अपने प्रत्येक अनुभव को चेतना के साथ देखने और जीने लगता है।
  11. इसी जीवंत स्मरण से अघोर आनंद साधक की यात्रा प्रारंभ होती है।

Future chronological entries