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Sutra 03 — पकड़ और विरोध के पार

SUTRA 03 · चिंतन

ना भोग न वियोग | ना योग न विनियोग |
ना संभोग न उपभोग | ना अनुराग न भव रोग |

पकड़ और विरोध के पार

बार-बार आने वाला “ना” मन की परिचित श्रेणियों को ढीला करता है। भोग और वियोग, उपभोग और अनुराग—इन सबके बीच मन किसी अनुभव को पकड़ना और किसी से बचना चाहता है। इस सूत्र को उस पकड़ की जाँच के निमंत्रण की तरह पढ़ा जा सकता है।

आपके लेखन का प्रश्न है: इच्छाओं की पूर्ति क्या जीवन को पूर्ण कर देती है? अनुभव का पीछा करना और अनुभव से भागना, दोनों में एक ही बेचैनी छिपी हो सकती है। आत्मचिंतन तब शुरू होता है जब हम देखते हैं कि अगला अनुभव हमें पूरा कर देगा—यह अपेक्षा कहाँ से उठती है।

स्वयं से एक प्रश्न

किसी चाह या विरोध को तुरंत सही-गलत कहे बिना देखें। उसके पीछे कौन-सी कमी की भावना काम कर रही है?

इस सूत्र और “Aumnific content contemplation” के विचारों पर आधारित एक व्याख्यात्मक चिंतन।

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