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Sutra 08 — ध्यान देना, ध्यान में रहना

SUTRA 08 · चिंतन

ध्यान करो मत, बस ध्यान दो।
अखंड, निरंतर स्वरूप ध्यान में रहो।

ध्यान देना, ध्यान में रहना

“ध्यान करो मत” को किसी अभ्यास का निषेध मानना आवश्यक नहीं। इसे उस प्रयास की ओर संकेत की तरह पढ़ सकते हैं जिसमें ध्यान भी प्राप्त करने योग्य वस्तु बन जाता है। “ध्यान दो” साधारण क्षण में उपस्थित होने का सीधा आमंत्रण है।

आपके लेखन में विचारों को देखने के बाद प्रश्न उठता है कि ये विचार किसे आ रहे हैं। यह जिज्ञासा केवल आँखें बंद करने तक सीमित नहीं रहती। बोलते, सुनते और काम करते समय भी हम देख सकते हैं कि कौन-सी कल्पित पहचान बचाई जा रही है और ध्यान कहाँ बँट रहा है।

स्वयं से एक प्रश्न

एक छोटा काम पूरे ध्यान से करें। ध्यान भटके तो स्वयं को दोष दिए बिना वापस लौटें।

इस सूत्र और “Aumnific content contemplation” के विचारों पर आधारित एक व्याख्यात्मक चिंतन।

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