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SHIVA MANTRA 01ॐ नमः शिवाय॥oṃ namaḥ śivāyaभावार्थशिव को मेरा नमन।MeaningI bow to Shiva.A moment to reflectA brief invocation can hold a spacious intention. Bowing here may be contemplated as a softening of pride and a willingness to meet life

MANTRA 02 · CONTEMPLATIONत्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭivardhanam | urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya mā amṛtāt ||Source: Ṛgveda 7.59.12भावार्थहम सुगंधित और पोषण बढ़ाने वाले त्र्यम्बक की उपासना करते हैं। जैसे पका फल डंठल

SUTRA 02 · CONTEMPLATIONMIND BLENDING, MIND BENDING! MIND ENDING. “MIND yo!ur MIND”Mind your mindThe wordplay moves from blending and bending the mind toward loosening identification with it. One reading takes the sutra as an invitation to observe thought, rather

SUTRA 01 · चिंतनजग जा साधक । पुकार आलख । छोड दे दुनियादारी ।प्रभू भजन की तुरीया न्यारी ।।साधक का जागरणयह पुकार उस साधक के लिए है जो बाहरी व्यस्तता के बीच अपने भीतर की आवाज़ सुनने लगा है।

SUTRA 03 · चिंतनना भोग न वियोग | ना योग न विनियोग | ना संभोग न उपभोग | ना अनुराग न भव रोग |पकड़ और विरोध के पारबार-बार आने वाला “ना” मन की परिचित श्रेणियों को ढीला करता है।

SUTRA 04 · चिंतनदृष्टि बदलो | सारी सृष्टि बदलेदृष्टि बदले, संबंध बदलेपरिस्थिति वही रह सकती है, पर उसे देखने का ढंग बदलते ही उसके साथ हमारा संबंध बदल जाता है। जिसे हम बाधा कहते थे, उसमें सीख दिखाई दे

SUTRA 05 · CONTEMPLATIONlook differently, the world looks differentLook differentlyA familiar place can seem entirely different when approached with curiosity. One reading takes the sutra as a reminder that perception is shaped by expectation, memory, and attention. Looking again

SUTRA 06 · चिंतनजिसका ये ऐलान हे, की वो मजेमे हे, निश्चिंत हे।या तो वो फ़क़ीर हे, या वो नशेमे हे।निश्चिंतता और विस्मृतिफ़क़ीर और नशे में डूबे व्यक्ति की तुलना एक तीखा प्रश्न खोलती है: हमारी बेफ़िक्री जागरूकता से

SUTRA 07 · चिंतनजो आत जात हे, परमात्म वो नाही। जो नित्य प्राप्त हे, परमात्म वो सही।।आने-जाने के बीच नित्य की खोजयह सूत्र बदलते अनुभव और नित्य उपलब्ध परमात्मतत्त्व में भेद करता है। विचार, भावना और परिस्थिति आते-जाते हैं।

SUTRA 08 · चिंतनध्यान करो मत, बस ध्यान दो। अखंड, निरंतर स्वरूप ध्यान में रहो।ध्यान देना, ध्यान में रहना“ध्यान करो मत” को किसी अभ्यास का निषेध मानना आवश्यक नहीं। इसे उस प्रयास की ओर संकेत की तरह पढ़ सकते