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SUTRA 09 · CONTEMPLATIONDon’t do meditation. Live in meditation.Living in meditationOne reading takes the line as an invitation to let attentive presence extend beyond a formal session. Listening, walking, and working can all become opportunities to notice experience as

SUTRA 10 · चिंतनज़हरीला दिव्य प्याला, आप ने परोसा है। हम जाम उठाएँगे, भोले पे भरोसा है॥कठिनाई के बीच भरोसाइस पद के प्याले को कठिन अनुभव का काव्यात्मक प्रतीक समझा जा सकता है। भोले पर भरोसा उस क्षण का

SUTRA 11 · चिंतनऐसे अदभुत राक्षस है रावण पेश आते है। दुनियादारी की आवेश में, दिल से राम नाम गाते है॥विरोधाभास के भीतर भक्तिरावण की छवि और रामनाम का स्मरण साथ आकर मनुष्य के भीतर के विरोधाभास को सामने

SUTRA 12 · चिंतनतेरी शान, मेरी पहचान।मेरी शान, तेरी पहचान॥तेरे और मेरे के बीच अपनापनइन पंक्तियों का पारस्परिक भाव पहचान को संबंध में रखता है। भक्ति की दृष्टि से इसे उपासक और आराध्य के बीच आत्मीयता की अभिव्यक्ति मान

SUTRA 13 · चिंतनक्या हे सब? कब हे सब? जो हे ही नहीं वो हे सब। तो बोलो क्या ही करोगे? सब गजब सब गजबनिश्चित उत्तरों से आगे विस्मयलगातार प्रश्न मन की उस आदत को छेड़ते हैं जो हर

SUTRA 14 · चिंतनसत्य अनुभव, नित्य अनुभूति | सनातन विभूति, परम प्रचिती जीवन अखंड आत्म मंथन | बोलो जय अलख निरंजनजीवन ही अखंड आत्ममंथनयह पद सत्य, अनुभूति और आत्ममंथन को एक सतत जीवनयात्रा में जोड़ता है। किसी एक अनुभव

साधक को जागने, दुनियादारी छोड़ने और प्रभु के भजन में लीन होने का आह्वान करती एक छोटी-सी आध्यात्मिक कविता।

An inward journey begins with questioning familiar beliefs and seeking truth beyond illusion. A reflection on contemplation, grace, and discovering the self’s essential nature at Aumnific Self Temple.