Sutra 11 — विरोधाभास के भीतर भक्ति
SUTRA 11 · चिंतन
ऐसे अदभुत राक्षस है रावण पेश आते है।
दुनियादारी की आवेश में, दिल से राम नाम गाते है॥
विरोधाभास के भीतर भक्ति
रावण की छवि और रामनाम का स्मरण साथ आकर मनुष्य के भीतर के विरोधाभास को सामने रखते हैं। बाहर का व्यवहार, संसार की उलझन और भीतर की भक्ति हमेशा एक सीध में नहीं होते। यह सूत्र दूसरे को परखने से पहले स्वयं को देखने का दर्पण बन सकता है।
आपके चिंतन में आत्मसंवाद का आग्रह है। सच्चे आत्मसंवाद में अपनी विसंगतियों को भी जगह देनी होती है: जिस करुणा की बात करते हैं, क्या वह व्यवहार में है? जिस शांति को चाहते हैं, क्या उसे दूसरों के लिए भी संभव बनाते हैं? ईमानदारी और करुणा साथ रहें तो यह जाँच दोषारोपण नहीं, परिवर्तन की शुरुआत बनती है।
स्वयं से एक प्रश्न
अपने किसी संकल्प और व्यवहार के बीच एक अंतर पहचानें। उसे कम करने के लिए आज कौन-सा छोटा कदम संभव है?
इस सूत्र और “Aumnific content contemplation” के विचारों पर आधारित एक व्याख्यात्मक चिंतन।