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Sutra 13 — निश्चित उत्तरों से आगे विस्मय

SUTRA 13 · चिंतन

क्या हे सब? कब हे सब? जो हे ही नहीं वो हे सब।
तो बोलो क्या ही करोगे? सब गजब सब गजब

निश्चित उत्तरों से आगे विस्मय

लगातार प्रश्न मन की उस आदत को छेड़ते हैं जो हर अनुभव को तुरंत परिभाषा में बाँध देना चाहती है। “सब गजब” में एक हल्का, खेलता हुआ विस्मय सुनाई देता है। इस पाठ में प्रश्न किसी तैयार निष्कर्ष का रास्ता नहीं, देखने की ताजगी का द्वार बनते हैं।

आपके चिंतन में पुरानी धारणाएँ मिटने के साथ नई धारणाओं की दीवार न बना लेने की बात है। यह सूत्र उसी खुली जगह का साथी हो सकता है। हर अनिश्चितता को तुरंत समस्या मान लेने के बजाय कुछ देर उसके साथ रहना जिज्ञासा को जीवित रखता है।

स्वयं से एक प्रश्न

एक ऐसा प्रश्न चुनें जिसका उत्तर आपको अभी नहीं मालूम। बिना जल्दबाज़ी उसे खुला छोड़ देने पर कैसा लगता है?

इस सूत्र और “Aumnific content contemplation” के विचारों पर आधारित एक व्याख्यात्मक चिंतन।

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